चलो उन गलियों में जहाँ हम अपनी एक बार फिर से आवाज़ उठाए चलो उन सड़कों पर जहाँ हम अपना नारा एक होने का लगाए। चलो उन गलियरों से जहाँ हर व्यक्ति का साथ और उनसे बात हो पाए । चलो यारी जंतर मंतर चलो एक सरकार को एक ज़ोर का धक्का फिर से लगाए। हो सकता है आवाज़ उठाने के चक्कर में आपके साथ बहुत नुक़सान हो जाए । हो सकता है कि वो आपकी कोई बात भी नहीं सुनी जाए। हो सकता है की अवाज उठाने के चक्कर में आपकी नौकरी चली जाए। हो सकता है आपका दोस्त ही आपका साथ छोड़ के चले जाए । हो सकता है कि आप अपनी ख़ुद की बनी पहचान से अलग हो जाए । तो क्या तब भी आवाज़ उठाने चाहोगे और साथ चलना चाहोगे जहाँ आप यह सब भी खो सकते हो। देखा जाए तो यह नारे का दौर कभी कभी फ़ैशन सा लगता है - २ जहाँ पर लोग अपनी सोशल मीडिया की प्रोफ़ायल पिक्चर को बदलने के किए हाथ में झंडा लिए , एक हाथ ऊपर किये। अवाज लगते हर अपनी फ़ोटो खिचवाने...
Pehchan पहचान
नज़रिया आपके बीच रहने वाले एक व्यक्ति का