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एक कोशिश फिर की जाए

चलो उन गलियों में जहाँ हम अपनी एक बार फिर से आवाज़ उठाए   चलो उन सड़कों पर जहाँ हम अपना नारा एक होने का लगाए। चलो उन गलियरों से जहाँ हर व्यक्ति का साथ और उनसे बात हो पाए  । चलो यारी जंतर मंतर चलो एक सरकार को एक ज़ोर का धक्का फिर से लगाए। हो सकता है आवाज़ उठाने के चक्कर में आपके   साथ बहुत नुक़सान हो जाए  । हो सकता है कि वो आपकी कोई बात भी नहीं सुनी जाए। हो सकता है की अवाज उठाने के चक्कर में आपकी नौकरी चली जाए। हो सकता है आपका दोस्त ही आपका साथ छोड़ के चले जाए  । हो सकता है कि आप अपनी ख़ुद की बनी पहचान से अलग हो जाए  । तो क्या तब भी आवाज़ उठाने चाहोगे और साथ चलना चाहोगे जहाँ आप यह सब भी खो सकते हो। देखा जाए तो यह नारे का दौर कभी कभी फ़ैशन सा लगता है - २ जहाँ पर लोग अपनी सोशल मीडिया की प्रोफ़ायल पिक्चर को बदलने के किए हाथ में झंडा लिए , एक हाथ ऊपर किये। अवाज लगते हर अपनी फ़ोटो खिचवाने...

तुम एक किताब हो

हाँ तुम एक कोमल, सुंदर, अनसुनी और अनकही किताब हो। जिसे किसी ने समझने की शायद पूरी कोशिश नहीं की। एक बार रुककर , ठहर कर पढ़ने की कोशिश नहीं की। इस कहे जाने वाली रफ़्तार की दुनिया में , इस किताब के बाहरी कवर को ही किताब समझ कर साथ चलने की ग़लती की। सब कुछ तो है इस किताब में, एक ज़िंदगी को सही तौर पर जीने के लिए । एक ऐसी किताब, जिसको जितना पढ़ने की कोशिश करो उतना ही उलझा सा महसूस करो। मैं ख़ुश क़िस्मत हूँ, हाँ मैं ख़ुश क़िस्मत हूँ की मैं इस किताब से रूबरू हो पाया, थोड़ी देर रुक कर पढ़ पाया, उन पन्नों पर लिखें-उभरे हुए शब्दों का स्पर्श कर पाया । शायद इसीलिए, की मैं इंसानों की बातों को और उनके अल्फ़ाज़ों की क़द्र करता हूँ. कही शायद इसीलिए इस किताब को थोड़ा समझ पता हूँ। हाँ तुम एक किताब हो, एक किताब जो एक व्यक्ति को प्यार, एहसास, और ज़िंदगी जीने का सलिका समझाती है। जो एक व्यक्ति को इज़्ज़त के साथ ज़िंदगी जीने मक़सद बतलाती है । जो दर्द और दुःख में आपका साथ निभाती है। एक ऐसी किताब जो हर ख़ामोशी में उठे हुए सवाल का जवाब बतलाती है । किताब, जो बिन लिखे और कहे शब्दों से मुझे मेरा अपने होने का ...

मुझे अकेला कर गए

हाँ मेरे दोस्त मुझे अपने ही लोग बाहर भी अकेला कर गए । तुम यक़ीन मानों मैंने वो सब किया जो एक आम व्यक्ति अपनी हद में रह कर कर सकता है। जैसे सबसे मिलकर प्यार से बातें की बात करने से पहले पूरी तैयारी की सुनो, कपड़े भी ढंग के पहने! और तहज़ीब से भी बातें की मगर मेरे दोस्त में ना चाह कर भी इस दौर में पीछे रह गया लोगों की बातों में हामी भर कर भी अकेला रह गया क्या ग़लती है मेरी बस यही की अकल चलती है मेरी? लोगों से सवाल करो तो वो बातों को पलट देते है सवाल ना करो को मंदबुधी समझते है अब तुम ही बताओ मेरे दोस्त अब कहाँ अधूरा रह गया? हमने फिर एक बार इस दौर में लोगों के साथ चलने की कोशिश की उनके इशारे पर आगे बढ़ने की शुरुआत की मगर फिर क्या वोहि अपने इशारे को लेकर बीच में ही पलट फेर कर गए और फिर दुबारा ऐ मेरे दोस्त मुझे यह अकेला कर गए।। राहुल कु. विमल 

अकेलेपन की ज़रूरत

अपने होने का एहसास आपको कब महसूस होता है?   एक सवाल जिसका कोई निश्चित समय नहीं, कोई स्वरूप नहीं, पता ठिकाना नहीं। भला, क्या ज़रूरत है किसी को इस सवाल के जवाब की? ज़रूरत- इस रफ़्तार भरी ज़िन्दगी के साथ क़दम से क़दम मिलाकर चलने की। ज़रूरत- अपने आप को सही तौर पर पहचान करने की। ज़रूरत- दिए गए काम को सही तरह से करने की। ज़रूरत- सही और ग़लत में भेद करने की। इसीलिए इस सवाल के जवाब की ज़रूरत है। क्योंकि, सब अपनी गति से ही तो चल रहा है। यह मेट्रो, यह बस, दुकान का शटर, दफ़्तर के लिफ़्ट का दरवाज़ा, और घड़ी की सुई। फिर भी ना जाने क्यूँ यह रफ़्तार मेरे अपने होने के एहसास को कही खो रहा है। क्या अकेलापन सच में ज़रूरत है मेरी और आपकी? राहुल विमल  

तुम्हें, दिवाली मनाने की इच्छा है?

तुम्हें, दिवाली मनाने की इच्छा है ? अरे भई चलो मना लेना, मगर मेरे कुछ सवाल है, उनका पहले जवाब दे देना। Image Courtesy: Happy Holi SMS क्या तुम लोगों की ज़िंदगी से प्रेम नहीं करते हो? क्या खुली हवा में साँस लेना पसंद तुम नहीं करते हो? क्या अपनी आँखों से तुम इतनी नफ़रत करते हो? इसीलिए सोचा पूछ लूँ की, आख़िर तुम क्यों दिवाली, पटाखे फोड़कर मानना चाहते हो? क्यों दिवाली में बम और पटाखे तुम्हें फोड़ने है? आख़िर क्यों तुम्हें पटाखों के फटने की आवाज़ से ख़ुशी मिलती है? क्या तुम्हें पटाखों के फटने के शोर से प्यार है? कौन सी वो बात है जो तुम्हें अपना और अपने घर का इतना पैसा बम फोड़ने के लिए ख़र्च करने पर मजबूर कर देती है? कोई तो वजह होगी तुम्हारी जो तुम आज दिवाली में पटाखे फोड़ना चाह रहे हो? शायद वो वजह तुम जानते होंगे। इसीलिए सोचा पूछ लूँ की, आख़िर तुम क्यों दिवाली, पटाखे फोड़कर मानना चाहते हो? क्या तुम्हें पंछियों से प्यार नहीं है? क्या तुम्हें सुबह उठकर ताज़ी हवा होने का अब अहसास नहीं है? क्या तुम्हें उन छोटे जानवरों से लगाव नहीं है ? या तुम्हें अपने और आने वाले कल से भी ...

सामाजिक बदलाव की कहानी “नाला काजी पाड़ा से टर्की तक” - सुनील विमल

आज मैं आपके साथ एक बदलाव की कहानी साझा करना चाहता हूँ। यह कहानी Jay Prakash की है। एक ऐसा बदलाव का सफ़र जो “नाला काजी पाड़ा, आगरा से टर्की तक” बयान होता है। इस सफ़र की शुरुआत उत्तरप्रदेश के शहर आगरा के छोटे से इलाक़े ‘नाला काजी पाड़ा’ से शुरू होती है । 8/10 फ़ीट के घर में रहकर वह उन ऊँचाइयों को छूता है जिसकी कल्पना शायद किसी ने कभी की ही नहीं थी। जय के बदलाव का सफ़र इंटरस्कूल से शुरू होता जब वह पढ़ाई को समाज में सही तौर पर इस्तेमाल करने के लिए पढ़ने कि ठानता है नाकी अच्छे अंकों के लिये। शुरू से ही उसका नाम होनहार विद्यार्थियों की तालिका में अवल दर्जे पर दर्ज होता रहा है। उसकी सोच रही है कि पढ़ाई ज्यादा अंक लाने के लिये नहीं बल्कि, जो भी पढ़ा है उससे जीवन कैसे कामयाब बनाया जाए।उसका सपना था की उसे स्कूल के बोर्ड पर नाम लिखवाना है जहाँ से उसके नाम चाहकर भी कोई मिटा न सकें। जिसे उसने हासिल भी किया, जिसकी मुझें बहुत खुशी है। घर के बाहर नाले की एक तस्वीर यह बात सन 2011 की है जब उसका नाम दो इंजीनियरिंग कॉलेज की चयनित हुआ था। वह दिल्ली इंजीनिरिंग कॉलेज (DCE) के जगह गौतम बुद्धा विश्वविध...

अगली रेल दुर्घटना के लिए तैयार रहें!

अगली रेल दुर्घटना के लिए तैयार रहें...निजीकरण के स्वागत मे इंसानों की बलि दी जा रही है भारतीय रेल मे। भारतीय रेल मे अपनी संचार व्यवस्था हुअा करती थी। MTNL और BSNL से अलग। दो तरह के फोन थे एक हैण्डल घुमा कर डायल होता था दूसरा साधारण फोन की तरह हुआ करता था। जब 7 digit के MTNL नंबर हुआ करते थे तब रेलवे का साधारण फोन 4 digit के नंबर हुआ करते थे। ये फोन रेलवे की अस्पताल की एंबुलेंस सेवा और डाॅक्टरों के कमरो मे लगे दिखते थे। रेलवे अफसर के घरों मे भी हुआ करता था ये फोन। इस फोन को अटेण्ड करने के लिए बाकायदा telephone attendent and Dak khalasi हुआ करता था। दूसरा हैण्डल घुमाकर डायल करने वाला फोन रेलों को दौड़ाने के लिये काम मे लाया जाता था। ये रेलवे की हाॅटलाइन था। रेलवे का Signal and Telecommunication Department इसी संचार विभाग मे रेलों को चलाने के लिए टोकन व्यवस्था भी थी। आपने देखा होगा इंजन ड्राइवर दौड़ती गाड़ी से एक बड़ा सा छल्ला फेंकता था। एक दूसरा छल्ला थोड़ा आगे खम्बे पर लटका होता था जिसे ड्राइवर झपट लेता था। अगर वो इसे न झपट पाता तो गाड़ी रोक देता था। इसी छल्ले मे लोहे की एक बड़ी गोल...