हाँ तुम एक कोमल, सुंदर, अनसुनी और अनकही किताब हो।
जिसे किसी ने समझने की शायद पूरी कोशिश नहीं की।
एक बार रुककर , ठहर कर पढ़ने की कोशिश नहीं की।
इस कहे जाने वाली रफ़्तार की दुनिया में ,
इस किताब के बाहरी कवर को ही किताब समझ कर साथ चलने की ग़लती की।

सब कुछ तो है इस किताब में, एक ज़िंदगी को सही तौर पर जीने के लिए ।
एक ऐसी किताब, जिसको जितना पढ़ने की कोशिश करो उतना ही उलझा सा महसूस करो।
मैं ख़ुश क़िस्मत हूँ, हाँ मैं ख़ुश क़िस्मत हूँ
की मैं इस किताब से रूबरू हो पाया, थोड़ी देर रुक कर पढ़ पाया, उन पन्नों पर लिखें-उभरे हुए शब्दों का स्पर्श कर पाया ।
शायद इसीलिए, की मैं इंसानों की बातों को और उनके अल्फ़ाज़ों की क़द्र करता हूँ. कही शायद इसीलिए इस किताब को थोड़ा समझ पता हूँ।
हाँ तुम एक किताब हो,
एक किताब जो एक व्यक्ति को प्यार, एहसास, और ज़िंदगी जीने का सलिका समझाती है।
जो एक व्यक्ति को इज़्ज़त के साथ ज़िंदगी जीने मक़सद बतलाती है ।
जो दर्द और दुःख में आपका साथ निभाती है।
एक ऐसी किताब जो हर ख़ामोशी में उठे हुए सवाल का जवाब बतलाती है ।
किताब, जो बिन लिखे और कहे शब्दों से मुझे मेरा अपने होने का अहसास कराती है।
जिसे किसी ने समझने की शायद पूरी कोशिश नहीं की।
एक बार रुककर , ठहर कर पढ़ने की कोशिश नहीं की।
इस कहे जाने वाली रफ़्तार की दुनिया में ,
इस किताब के बाहरी कवर को ही किताब समझ कर साथ चलने की ग़लती की।
सब कुछ तो है इस किताब में, एक ज़िंदगी को सही तौर पर जीने के लिए ।
एक ऐसी किताब, जिसको जितना पढ़ने की कोशिश करो उतना ही उलझा सा महसूस करो।
मैं ख़ुश क़िस्मत हूँ, हाँ मैं ख़ुश क़िस्मत हूँ
की मैं इस किताब से रूबरू हो पाया, थोड़ी देर रुक कर पढ़ पाया, उन पन्नों पर लिखें-उभरे हुए शब्दों का स्पर्श कर पाया ।
शायद इसीलिए, की मैं इंसानों की बातों को और उनके अल्फ़ाज़ों की क़द्र करता हूँ. कही शायद इसीलिए इस किताब को थोड़ा समझ पता हूँ।
हाँ तुम एक किताब हो,
एक किताब जो एक व्यक्ति को प्यार, एहसास, और ज़िंदगी जीने का सलिका समझाती है।
जो एक व्यक्ति को इज़्ज़त के साथ ज़िंदगी जीने मक़सद बतलाती है ।
जो दर्द और दुःख में आपका साथ निभाती है।
एक ऐसी किताब जो हर ख़ामोशी में उठे हुए सवाल का जवाब बतलाती है ।
किताब, जो बिन लिखे और कहे शब्दों से मुझे मेरा अपने होने का अहसास कराती है।
मगर आज भी कुछ पन्ने अन छुए से रह गए है
जो मुझे आज भी तुमसे अंजाना सा महसूस करवाने लगते है।
जब भी मैं सुनता हूँ तुम्हारे उन बंद पन्नों के बारे में,
थोड़ा सा तुमसे अंजाना सा महसूस करने लगता हूँ ।
कहने को तो कहा जा सकता है की ऐसी किताबें बहुत होंगी इस दुनिया में मगर,
या इस बात को कह कर मैं इस किताब को नज़रंअदाज कर दूँ ?
कहने को तो बहुत कुछ है मगर क्या इस किताब की सच्चाई की बात करना बंद कर दूँ?
राहुल कु. विमल
जो मुझे आज भी तुमसे अंजाना सा महसूस करवाने लगते है।
जब भी मैं सुनता हूँ तुम्हारे उन बंद पन्नों के बारे में,
थोड़ा सा तुमसे अंजाना सा महसूस करने लगता हूँ ।
कहने को तो कहा जा सकता है की ऐसी किताबें बहुत होंगी इस दुनिया में मगर,
या इस बात को कह कर मैं इस किताब को नज़रंअदाज कर दूँ ?
कहने को तो बहुत कुछ है मगर क्या इस किताब की सच्चाई की बात करना बंद कर दूँ?
राहुल कु. विमल
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