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Showing posts from July, 2017

बहुजन का मीडिया या मीडिया के लिए बहुजन?

Photo Courtesy: Satyendra Murli's Facebook profile अभी फ़िलहाल सत्येन्द्र मुरली (अम्बेडकरवादी पत्रकार के नाम से मशहूर) को DD न्यूज़ ने नोटबंदी पर की गयी प्रेस कॉन्फ़्रेन्स (8 नवम्बर 2016) को बर्खास्त कर दिया गया है।  कमाल की बात यह है की, जिस व्यक्ति ने देश हित में अपनी नौकरी दाव पर लगा कर भारत के प्रधान मंत्री द्वारा की गयी घोषणा(अ-सामवैधानिक थी, जिसके सबूत वह प्रेस कॉन्फ़्रेन्स दे चुके है) के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई, उसे आज बिना किसी कारण के नौकरी से निकाल दिया गया है, पिछले तक़रीबन ) 9 महीने से बिना तनखाह के जीने को मजबूर कर दिया गया और कोई भी बहुजन लीडर इस पर कुछ बोल नहीं रहा बजाए जय भीम, जय भीम के!   जो व्यक्ति पिछले कई वर्षों से बहुजन समाज की आवाज़ मुख्य धारा में लाने के लिए सरकार से कई दफे दो हाथ कर चुका है (बाबा साहेब अम्बेडकर के कार्टून के जवाब में गांधी का कार्टून, DD न्यूज़ में नौकरी में आरक्षण ना लागू करने के लिए कोर्ट में केस करना), वहीं उसके लिए आज जितनी भी बहुजन मीडिया पोर्टल (कहने के लिए सिर्फ़) है वह इस पर कुछ भी नहीं लिख रहे है!  यह सच में एक चौकने व...

यह समाज किसका?

समाज एक ऐसा शब्द जो आपको हर वक़्त अपने होने का अहसास कराता है, आपकी परेशानी की जड़ अथवा निवारण भी बनता है। यह शब्द रिकार्ड के हिसाब से लैटिन के शब्द socius से शुरुआत होता हुआ फ़्रेंच शब्द societe से बना है जिसका मतलब 'एक समूह जहाँ सामूहिक दोस्तीय व्यवहार हो या किया जाए'। शाब्दिक अर्थ से वर्तमान में हो रहे काम को करने और समझने के तरीक़ों में बहुत अंतर देखने को मिलेगा। समाज का मतलब अगर हम भारतीय संस्कृति के हिसाब से देखें तो यह शब्द कई ब्रांच में बटता दिखाई देगा। भारत में यह शब्द सिर्फ़ शाब्दिक अर्थ तक सीमित नहीं रहा है। यहाँ समाज के नाम पर आपको कई अलग -२ तरह के समूह देखने को मिलेंगे जो अपने स्तर पर समाज की परिभाषा को परिभाषित करते है। उदाहरण के तौर पर- यह छोटा अथवा बड़ा समाज, ग़रीब-अमीर, ऊँचा- नीचा, और इस जात- उस जात का आदि। मगर भारत में जात के हिसाब से अधिकतर लोग समाज को परिभाषित करते है। समाज के अर्थ के हिसाब से मतलब तो एक ही है मगर एक लेबल का जुड़ाव भी यहाँ पर देखने को मिलेगा जो आपको समाज की शाब्दिक परिभाषा से अलग सोचने पर मजबूर करेगा। जब भी हम समाज कि बात करते है तो...

समय की क़दर कहीं गुम है

यह बात बहुत दिनों से ज़हन में चल रही है। आख़िर क्या वजह है की सब कुछ जान कर भी मैं आज अपने आप से अनजानों सा बर्ताव कर रहा हूँ?  उन बातों से भाग रहा हूँ जिनपर मैं कभी पीछे नहीं हटा, जिन्हें मैंने अपने ज़हन में हर वक़्त रखा। आख़िर कौन है जिसने मुझे मेरे ही बनाए हुए रास्ते पर ना चलने के लिए कई तरह के विश्वास जैसे रास्ते दिखा कर मुझे वहीं पर एक ही जगह पर खड़े होने पर मजबूर कर दिया? Image Courtesy: Clipartix.com मैं एक ऐसी स्थिति में जीने लगा हूँ की समझ में नहीं आता की किसे दोष दूँ और किसे ना दूँ। अपने ही काम को ना करपाने की वजह से कितने लोगों को दोषी क़रार करूँ? मैं ऐसा तो नहीं था पहले और ना कभी होना चाहता हूँ। शायद मन की एकाग्र (एक ही जगह पर) ना होने की वजह से मैं ऐसा बर्ताव तो नहीं करने लगा हूँ? कई बार लिखते लिखते अपने आप को मैं सही ढंग से देख पता हूँ समझ पता हूँ मगर फिर भी ऐसा क्या है जो मैं कुछ चाह कर भी नहीं कर पा रहा हूँ? अपने आस पास जब भी लोगों को पढ़ाई, आगे बढ़ने की बातें करते एवं सुनते देखता हूँ तो थोड़ा निराश हो जाता हूँ। मुझे भी कुछ कर दिखाने की ललक है, जिज्ञासा है मगर...