दिल्ली व दूसरे शहरों में हाल ही में एक ऐसा समाज उभरा
है, जिसे हम भटकल समाज भी कह सकते हैं | भटकल समाज से यहाँ मतलब उन बातों से है जिन्हें
हम अपने समाज में आये दिन देखते हैं जैसे बहुत से लोग आपको आजकल ऐसे भी मिलते या
मिलेंगे जिनकी ख़ासियत, बिना तथ्यों के आपसे बात करना, और किसी की कही सुनी बातों में
आकर दूसरों को गलत तरीके से समझाना और पूरी तरीके से विश्वास दिलाने की कोशिश करना
|
यहाँ भटकल समाज का
मतलब उन युवाओं से है जो डाक्यूमेंट्स के आधार पर अच्छे पढ़े-लिखे तो नजर आते हैं
मगर जब उनसे सामान्य ज्ञान के बारे में बात करें तो यह मुश्किल से उन सवालों का
जवाब दे पाते हैं| हमारे
समाज में एक ऐसी पीड़ी बनकर उभर रही है जिसे आजकल के बड़े एवं विशाल मॉल पसंद हैं न
कि घर, उन्हें मॉलस में आराम नजर आता है,
उसमे घूमना, शॉपिंग करना, मूवी देखना, मैक-डोनाल्ड में बर्गर खाना, बहुत पसंद है
बजाये किसी के साथ सामाजिक बात करना और किसी परेशानी के खिलाफ एक साथ होकर आवाज
उठाना |
भटकल समाज के सभी
पहलुओं को समझने व समझाने के लिए हमें सबसे पहले अपने देश
की शिक्षा प्रणाली को समझना होगा बाद में दूसरे पहलुओं पर ध्यान देना होगा |
शिक्षा, एक ऐसा साधन है जिसके माध्यम से हर व्यक्ति अपने मानसिक तौर पर मजबूत होता
हैं और अपनी बुद्धि के अनुसार सही तौर पर उन बातों पर विचार और उन्हें नकार भी
सकता है और अपनी बात को अच्छी तरह व्यक्त भी कर सकता हैं | बहुत से राजनीतिज्ञ,
विचारक एवं समाज सुधारको
ने भी शिक्षा पर काफी जोर देकर कहा है की “किसी भी देश की अर्थव्यस्था उस देश की
शिक्षा के स्तर को देख कर ही तय की जा सकती हैं” | आज जिसे हम सूचना युग भी कहते
है वहां शिक्षा के बिना हम अपनी रोज-मरा की ज़िन्दगी में असहाय से नजर आते हैं |
पूर्व में हुए चुनावों में
इस समाज का सबसे बड़ा योगदान (इस्तेमाल)
भारत में पिछले लोकसभा चुनावो में बहुत ही हैरान करने वाले नतीजे सामने आये हैं जिन्हें नाकारा नहीं जा सकता मगर उन सभी बातों पर विचार किया जा सकता हैं| देखा जाए तो इस बार का चुनाव जमीन पर कम सोशल मीडिया पर ज्यादा लड़ा गया था क्योंकि भारत में सबसे ज्यादा संख्या में जो समाज है वह युवा हैं जो अपनी पहचान सोशल मीडिया पर बनाता आ रहा हैं| सिर्फ इसी कारण से बहुत से सत्ताधारियों नें अपना प्रचार का माध्यम फेसबुक और ट्विटर ही बना दिया जिसका परिणाम हम सब जानते ही हैं| सोशल मीडिया का भारी प्रभाव होने के कारण लोगो ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी नकार दिया जैसे, बहुत से मीडिया चैनलों ने गुजरात का असली विकास मॉडल अपने चैनल पर दिखाया और गुजरात विकास मॉडल क्या है यह भी बताया, मगर यह सब जानकर भी हमारे देश के युवा अधिक संख्या में एक ही राग अलाप रहे थे “अच्छे दिन आने वाले हैं”, और तो और मीडिया ने मोदी जी के 12 साल के कार्यकाल के बारे में भी जो तथ्य मीडिया ने दिए उन्हें भी लोगो ने सही नहीं समझना ही बेहतर समझा जैसे, जीडीपी का घटना, सरकारी नौकरी का कम होना, प्राइवेट कम्पनी को ज्यादा सहायता देना आदि |
भारत में पिछले लोकसभा चुनावो में बहुत ही हैरान करने वाले नतीजे सामने आये हैं जिन्हें नाकारा नहीं जा सकता मगर उन सभी बातों पर विचार किया जा सकता हैं| देखा जाए तो इस बार का चुनाव जमीन पर कम सोशल मीडिया पर ज्यादा लड़ा गया था क्योंकि भारत में सबसे ज्यादा संख्या में जो समाज है वह युवा हैं जो अपनी पहचान सोशल मीडिया पर बनाता आ रहा हैं| सिर्फ इसी कारण से बहुत से सत्ताधारियों नें अपना प्रचार का माध्यम फेसबुक और ट्विटर ही बना दिया जिसका परिणाम हम सब जानते ही हैं| सोशल मीडिया का भारी प्रभाव होने के कारण लोगो ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी नकार दिया जैसे, बहुत से मीडिया चैनलों ने गुजरात का असली विकास मॉडल अपने चैनल पर दिखाया और गुजरात विकास मॉडल क्या है यह भी बताया, मगर यह सब जानकर भी हमारे देश के युवा अधिक संख्या में एक ही राग अलाप रहे थे “अच्छे दिन आने वाले हैं”, और तो और मीडिया ने मोदी जी के 12 साल के कार्यकाल के बारे में भी जो तथ्य मीडिया ने दिए उन्हें भी लोगो ने सही नहीं समझना ही बेहतर समझा जैसे, जीडीपी का घटना, सरकारी नौकरी का कम होना, प्राइवेट कम्पनी को ज्यादा सहायता देना आदि |
वहीँ दिल्ली में विधानसभा के इलेक्शन के दौरान यही समाज चुनाव में बड़ी फेरबदल करने में काम आया| उस दौरान दिल्ली में एक और हवा बही थी जिसमे यह भटकल समाज आसानी से बह गया| इस समाज को गहरो तथ्यों को जानने की कोई उत्सुजता नहीं होती हैं बस उपरी तौर पर क्या है वही इनके लिए बहुत हैं| उस दौरान भी बहुत से ऐसे मुद्दे उठाये गए थे जिन्हें इस समाज ने बड़े जोर शोरे उठाया और साथ भी दिया और अंत में क्या परिणाम आया यह हम सब को पता ही है |
आखिर इन
सब बातों से हम क्या अंदाजा लगा सकते हैं, क्या हम सही जानकारी को सही मानना नहीं
चाह रहे है या दूसरों के झूठे बयानों को भी पत्थर की लकीर मान कर काम करना ही
बेहतर समझ रहे हैं|
वहीं दूसरी ओर आलिया भट्ट-
एक एक्टर होने के नाते थोडा बहुत समाज की जानकारी इन्हें होनी चाहिए मगर आलिया भट्ट
के हिसाब से भारत के रास्ट्रपति “पृथवीराज चौहान” हैं और तो और इन्हें बीजेपी का पूरा
नाम भी नहीं पता हैं |
भटकल समाज से फायदा उठाता
बाहरी मीडिया का एक रूप- अभी हाल ही में अमेरिकन चैनल “सेंट्रल कॉमेडी” के एक शो (द डेली शो) में इंडियन मीडिया के बारे में
कुछ बातें रिकॉर्ड कर भारतीय लोगो को दिखाया गया है जिसमें अमेरिकन चैनल ने इस बात
पर जोर दिया है कि इंडियन मीडिया किस कदर हमारे समाज में राजनीति से जुड़े लोगो के हाथ
की कटपुतली सी बन कर रह गयी है और तो और भारतीय लोगो ने भी इसे पूरी तरह से पत्थर की
लकीर मान कर मीडिया को कोसना शुरू कर दिया और अपना दिमाग सिर्फ आलोचना करने में लगा
दिया|
मगर यह १००% सच नहीं है क्योंकि इस पूरी विडियो में जिन पहलुओ को दिखाया गया वो भी
कुछ हद तक एक तरफा थे जैसे कि “मेल्लेन्नियम पोस्ट” एक राज्य उतर प्रदेश की राजधानी
लखनऊ में ही बिकता है और विडियो में दिखाया गया है कि यह एक नेशनल न्यूज़ पेपर है| एक रिक्शे वाला कभी
इंग्लिश अखबार नहीं पढता जबकि विडियो में रिक्शे वाले अखबार पढ़ भी रहे हैं और उस इंसान
को पहचान कर उसका नाम भी बोल रहे हैं ताज्जुब हैं लखनऊ में कुछ ज्यादा विकास दिखा दिया
“द डेली शो” ने|
देखा जाए तो यह समाज एक
आराम परस्त समाज भी कहा जा सकता है जो अपनी दिन्चरिया को सिर्फ और सिर्फ अपनी आराम
भरी ज़िन्दगी की जरूरतों को पूरा करने के लिए ही तैयार करता है | यह पीड़ी मानसिक तौर
पर मजबूत न होने के कारण आये दिन दूसरों के बनाये हुए जाल में फसे हुए नजर आते हैं|
आजकल इस पीडी का इस्तेमाल राजनीति में चुनावी फेर बदल के लिए एवं किसी के खिलाफ दंगें
भड़काने के लिए भी किया जा रहा हैं |
राहुल कु. विमल
राहुल कु. विमल
Comments
Post a Comment