विकासशील देश के एक छोटे से शहर में जहाँ ज्यादातर लोग जिनकी उम्र 25 से 35 के बिच में आती है उनकी ज़िन्दगी का सफ़र कुछ अलग ही मायने रखता है | अक्सर यह देखा गया है कि एक व्यक्ति जो की किसी अच्छे शहर में रह रहा हो वो अपनी ज़िन्दगी का लगभग आदा समय अपने घर के कमरे में ही बिता देता है | बरहाल यह बात तब साबित हो जाएगी जब आप अपने को इस बात को लेकर गहराई से अध्यन करेंगे |
आज मैं यहाँ आप सबके समक्ष एक कमरे की बात रख कर क्या कहना चाहता हूँ आप शायद यही विचार कर रहें होंगे कि आखिर ऐसा क्या हुआ, जो आज मैं एक कमरे के ऊपर कुछ लिखने के लिए मजबूर हो गया | आज का दौर जिसे हम "इनफार्मेशन एज " कहते है वहां आज एक व्यक्ति अपना पूरा समय कैसे व्यतीत करता है या कर लेता है |
एक सवाल जो मेरे जेहन में कई बार आ चूका हैं वो यह है कि, सुबह से लेकर रात तक एक ही कमरे में कैसे कोई अपना पूरा दिन बिता सकता हैं ? यह भी देखा गया है कि जब हम अपने दिन की सुरुआत करते है तो अपने दिमाग में एक काम काजो का ढाचा तयार कर लेते हैं और उसी के अनुसार अपना दिन बिताना शुरु कर देते है | मगर अब जिस तरह से समय बदलता जा रहा है जिसकी गति इतनी तेज हो चली है कि अगर हम उसके साथ अपना तालमेल नहीं बैठा पाते है तो बहुत पीछे या उस समय की वर्तमान स्तिथी से बहुत पिछड़ जाते हैं |
आज, जितना तनाव एक दिन में एक व्यक्ति लेकर जीवन व्यत्तित कर रहा है शायद उतना पहले नहीं हुआ करता था | आज टीवी चैनेलो ने अपने कई विकल्प के साथ संचार माध्यम "कम्युनिकेशन मध्यम" पर वर्चस्व स्थापित कर रखा हैं | उसका फायदा तो बहुत हैं मगर लोगो की पूंजीवादी सोच की वजह से इस माध्यम का सही और श्रेस्थ इस्तेमाल हम भारत में और बल्कि कई देशो में नहीं कर पा रहे हैं | आज एक व्यक्ति अपनी सोच से पहले टीवी द्वारा दी गयी सोच को अपने जीवन में लागू करके देखता हैं और कोरी कल्पना करके पूरा दिन बिता कर खुश रहता हैं, सिर्फ इसी लालच में की जो भी मैंने देखा वो शायद ही मेरे साथ होने वाला हैं, शायद जो व्यक्ति टीवी में कार चला रहा है शायद वही मेरे पास आने वाली हैं, और भी बहुत से ख्वाबी पुलिंदे बुनने लगता हैं | और जब यह कोरी कल्पना - कल्पना जैसी दिखने लगती है तभी उसका सामना असिलियत हो जाता हैं फिर बाद में यह बात उसे समझ में आती है कि जो काम, इच्छाएँ असिलियत से परे हैं वो कभी कल्पना करके सच कैसे हो सकती है |
एक बात जो दिल में घर कर जाती है कि, सिर्फ इंसान अपना समय बहुमूल्य समझता हैं और बाकियों का बिलकुल नहीं और शायद इसिलए आज देश में मैत्री भाव कम होता जा रहा है | शायद इसका कारण यह भी हो सकता है की इंसान की सोच टीवी द्वारा सिमित कर दी गयी है और इसी वजह से वह व्यक्ति इस दीवार के उस पार नहीं सोच पता और या यह भी कहा जा सकता है की वह सोचना ही नहीं चाह रहा हैं | जब जब टीवी का रिमोट हाथ में होता हैं तो अपने दिल के अनुसार हम चैनल बदल कर अपने दिल को खुश करने की कोशिश करते हैं | मगर यह ख़ुशी कुछ हि पल या फिर सिर्फ और सिर्फ चंद घंटो के लिए ही रहती हैं |
सोच की जो यात्रा श्रेणी हैं वो भारतीय रेल ग्राहक सहयता केंद्र की तरह ही हैं, की पता नहीं कब उनका फ़ोन आपके लिए उठ जाए और आपके सारे सवालो के जवाब वह बेहद आसानी से देदे और दूसरी तरफ कब आपका फ़ोन उठा कर काट दे और आपकी जरुरी जानकारी को भी दरकिनार कर दें |
अंत में बात यहीं पर आकर रुक जाती हैं की क्यों हम अपना जीवन कमरे में बिता रहे हैं जबकि हमे यह पता हैं की इस तरह से बिताया गया हर एक पल हमारे लिए कोई मायने नहीं रखता बल्कि हमारी बहुमूल्य जीवंन को एक जानवर के जीवन की तरह बिताने के लिए मजबूर सा कर रहा हैं जो भूका रहना भी नहीं चाहता मगर बिना मालिक के डंडे, लात , गालियाँ खाए उसे खाना भी नसीब नहीं होता | ठीक उसी तरह हम अपनी ज़िन्दगी टीवी के अनुसार बिता रहे हैं , हमें पता हैं की ज्यादातर जो कुछ भी टीवी पर दिखाया जा रहा हैं वह सही और स्पस्ट नहीं हैं मगर फिर भी हम टीवी के चैनल को बदलना पसंद करेंगे न की उसे बंद करना,
और शायद यही वजह है, आज इंसान हर जगह खुश होने के साधन होने के बावजूद भी अन्दर से खुश नहीं हैं
राहुल कु. विमल
राहुल कु. विमल
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